Thursday, September 23, 2010

मेरे पत्र जो छोड़े नहीं गये -------पत्र संख्या-1

पटना, 24.5.।                                                                                                      
अग्रज मुकुल जी                                                                                                          नमस्ते।                                                                                                              

आपके दो अलग-अलग पत्र मिले। विस्तृत जानकारी मिली। कल सोनू को टाटा के लिए स्टेशन छोड़ आया था। तत्पश्चात् अचानक पीठ में जोरों का दर्द महसूस करने लगा। आज कहीं जाकर थोड़ा बेहतर महसूस किय। आपके जाने के ठीक बाद नवल जी को मैंने किताब लौटा दी थी। उन्होंने अपना डेरा बदल लिया है। पास ही में है। फोन नं. वही पुरानावाला रहेगा। आपके कहे अनुसार गोपेश्वर जी से भी मुलाकात की। थोड़े 'गंभीर' हो चले हैं। डा. विनय कुमार स्वस्थ हैं। मनीष अपने तमाम लक्षणों के साथ चंगा है। लोक दायरा  के लिए आवश्यक तैयारी हो चुकी है। अंक बेहतर हो सकेगा। मणि जी अपना लेख नहीं दे सके हैं। रविवार को दे डालने का निश्चय किया है। मणि जी तक आपका प्रणाम मैंने पहुंचा दिया। काफी खुश हुए। पी-एच.डी का मेरा काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। कुमार किशोर से मिलकर आपके ‘न्यूजब्रेक’ वाले पैसे की पूछताछ करूंगा। आर.पी.एस. स्कूल में मैंने इन्टरव्यू दिया था। संभव है, वहीं चला जाऊं। छुट्टी के दिन वहां ज्यादा हैं। अपने काम के लिए अवसर कुछ ज्यादा मिल सकेगा। शिवदयाल जी से फोन करके ‘ज्ञान-विज्ञान’ में आपकी कविता के बारे में जानकारी ले लूंगा। ‘हंस’ में अभी कविता प्रकाशित नहीं हुई है। ‘इस बार’  के बारे में भी कोई विशेष जानकारी नहीं है। मधुकर जी से मिलना पड़ेगा। अलबत्ता सहमत  के ताजा (जनवरी-मार्च) अंक में इतिहास वाला लेख जिसे आपने न्यूजब्रेक  में छापा था, आ चुका है। एक भी शब्द काटा नहीं गया है। नवल जी के अनुसार पटना अब अरुण कमल के लिए खाली पड़ा है। असंदिग्ध सफलता हाथ लगेगी। यहां लालू की बेटी की शादी की चर्चा हिन्दी-अंग्रेजी अखबारों का मुख्य विषय बन चुकी है। लोक दायरा-4 छपते ही भेजूंगा। इस अंक को कैफी आजमी को समर्पित करने की योजना है। ‘युद्धरत आम आदमी’ का प्रतीक्षित अंक उपलब्ध नहीं हो सका है। हाथ लगते ही सूचित करूंगा। बाकी सब मजे में हैं। अजय-श्रीकांत से संपर्क कायम है। आज पत्नी ने टाटा फोन किया था। सब कुशल हैं। पिताजी इधर घर गये थे। सब ठीक-ठाक है। जावेद अख्तर को दो अंक भिजवा दिया है। चौथे अंक के साथ मिलूंगा। उन्हें भी आजीवन सदस्य बनाने की योजना है। एक सदस्य की और बढ़त हुई है। मन लगाकर/मारकर काम करेंगे। विशेष अगले पत्र में.                                                                                                       
राजू रंजन प्रसाद

Wednesday, September 22, 2010

पत्र संख्या-38

भागलपुर: 25 मार्च 2010।

चि. राजू जी,
सप्रेमाशीष,
आपका भेजा मूल्यवान उपहार ‘The Past and Prejudice’ मिला। बहुत ही रोचक और तथ्यपूर्ण बातों की जानकारी हुई। जन्मदिन के उपलक्ष्य पर भेजे उपहार के लिए कोटिशः धन्यवाद।
आपका
बाबूजी

Sunday, September 19, 2010

पत्र संख्या-37

जी डी 44 साल्टलेक,
कोलकाता, 30.07.2004।

आदरणीय राजू रंजन प्रसाद जी!

समकालीन कविता-
वर्ष 1-अंक 3 के पन्ने-
पंक्तियां आपकी-
वैसी भी होती है एक शाम
जब आंगन में पड़ा
मिट्टि (मिट्टी) का चूल्हा उदास होता है
और एक शाम आती है
वीरान गांवों में
आतंक और भय की चुप्पी के साथ
ख़ूबसूरत पंक्तियां-
खू़बसूरत कविता-
काव्यम् परिवार की तथा मेरी बधाई-

आशा है आप सानंद हैं.
आपका
प्रभात पाण्डेय 

Sunday, September 12, 2010

पत्र संख्या-36

केलंग, 20. 8. 2003.                                                                                                        
प्रिय श्री राजू रंजन जी,                                                                                                 
आपका कार्ड मिला। पत्रिका नहीं मिली। कोई भी पुरानी प्रति अवश्य भेजें। मालूम पड़ेगा, उधर लोग क्या लिख रहे हैं। ‘कथादेश’ वाले शायद कविताएं छापें। मैं फिलहाल कविताओं के अलावा कुछ भी नहीं लिख रहा। और खास कुछ पढ़ भी नहीं रहा। पीछे एक किताब शुरू की थी हिटलर की आत्मकथा ‘‘Mein Kampf ! मेरे छोटे से दिमाग के किसी खाने में फिट ही नहीं बैठते महाशय के विचार। किताब लाईब्रेरी की न होती तो शायद जला ही डालता। लेकिन कभी न कभी अवश्य पढूंगा। अभी शायद मुझमें परिपक्वता नहीं आई है। विद्यार्थी जीवन में भारतीय इतिहास में डूबा रहा। बाद में अस्तित्त्ववाद को पकड़ने की कोशिश की। नाकाम रहा। मुक्तिबोध की कविताओं ने मुझे मार्क्सवाद की ओर खींचा। वही ढाक के तीन पात। पूरी युवावस्था मैं वैचारिक उलझनों में पड़ा रहा। अन्त में रजनीश ने काफी गुत्थियां सुलझाईं। 90 से 95 तक रजनीश के अलावा और कुछ नहीं पढ़ा। फिर नौकरी मिली तो काम और कविता। पढ़ने के लिए वक्त नहीं है। वैसे रजनीश की तरफ खिंचने का मुख्य कारण उनकी तीखी व्यंग्यात्मकता तथा ‘‘काव्यात्मकता अभिव्यक्ति’’ रहा। रजनीश के भीतर मैंने संवेदनाओं का सघन पुंज पाया जो बहुत ही संतुलन के साथ उनके प्रवचनों में पिघल-पिघल कर बह रहा है। मैं ‘हंस’ पत्रिका का नियमित ग्राहक भी हूं। शेष अगली दफा। संपर्क में रहें .                                                                               आपका                                                                                                             
अजेय

Saturday, September 11, 2010

पत्र संख्या-35

केलंग, 25. 06. 2003।
प्रियवर,
भारतेन्दु शिखर  में आपकी कविताएं पढ़ीं। कविता संबंधी आपके विचार भी। जाहिर है प्रभावित होकर पत्र लिख रहा हूं। आप के विचार ‘‘युवा पीढ़ी की कविता के प्रति प्रतिबद्धता’’ को पुष्ट करते हैं। आज की कविता के औचित्य एवं महत्व की वकालत भी करते हैं।

मुझे अफसोस है कि हिन्दी क्षेत्र में कविता संबंध में कुछ अजीबो-गरीब धारणाएं बना ली गई हैं। अच्छे स्थापित साहित्यकार भी गलतफहमी का शिकार हैं। कविता महज ‘‘क्रान्ति का नारा’’ नहीं है उससे परे वह एक संवेदना है जो हममें मानवीयता का पोषण करती है। इस से बढ़कर कविता से कुछ और उम्मीद करना हमारी ज्यादती है। यही मेरी चिन्ता का विषय है।

वस्तुतः कुछ लोग सत्ता और राजनीति की चकाचौंध से प्रभावित होकर कविता के महत्व को नकार रहे हैं। ऐसे दिग्भ्रान्त साहित्यिकों को टोकना बहुत आवश्यक है। और हमारी पीढ़ी को ही यह उत्तरदायित्व निभाना है। आओ, हम गड़रिए बनें। उन भटके हुए पशुओं को सही मार्ग पर रखें। अपनी काठियां ज़रा और कठोर और भारी बनाएं। साहित्य या किसी भी कला को ‘‘सीढ़ी’’ बनने से बचाएं। कुछ कविताएं भेज रहा हूं। प्रतिक्रिया देंगे।
पुनश्च-छापना चाहें तो यथोचित संशोधन/संपादन कर के छाप सकते हैं। कविताएं अप्रकाशित हैं।

आपका
अजेय                                                                                                                   
प्रसार अधिकारी (उद्योग)                                                                                              
जिला उद्योग केन्द्र, केलंग                                                                                          
175132.

Friday, September 10, 2010

पत्र संख्या-34

गुलबीघाट, पटना-6: 24.10. 2000.

प्रिय भाई,
आपका कार्ड पाकर प्रसन्नता हुई, भले उसे एक रुपया जुर्माना देकर डाक से छुड़ाना पड़ा, क्योंकि आपने पंद्रह पैसेवाले कार्ड का उपयोग किया था, जबकि उसका दाम फिलहाल पच्चीस पैसे है। खैर!

‘कसौटी’ आपको पसंद आई, यह मेरे लिए संतोष की बात है। उसके पंद्रह अंक ही मुझे निकालने हैं और हफ्ता दिन पहले उसका पांचवां अंक भी दिल्ली में निकल गया है। आशा है, चार-छः दिनों में वह पटना भी पहुंच जाएगा। चौथे अंक में अशोक वाजपेयी पर मेरी टिप्पणी पर आपको कुछ एतराज है, तो ठीक ही है, क्योंकि मैं अब अगर-मगरवाली भाषा लिखने लगा हूं। कारण यह है कि युवावस्था की विदाई के साथ चीजें अपनी जटिलता में प्रकट होने लगती हैं और काला और सफेद रंग पहले की तरह साफ-साफ आकार दिखाई न पड़कर चितकबरे रूप में दिखलाई पड़ने लगते हैं।

आपने ‘साक्ष्य’ के अंक में मेरा लंबा लेख भी पढ़ा, इससे मुझे आत्मिक आह्लाद हुआ। बचपन में पढ़ाया गया था कि दर्शन, प्राण आदि शब्दों का बहुवचन में प्रयोग होता है, लेकिन यह सही नहीं है। हिंदी में ये शब्द दोनों वचनों में प्रयुक्त होते हैं, जो गलत नहीं है। किशोरीदास वाजपेयी का कहना है कि विसर्ग हिंदी की चीज नहीं, इसलिए ‘छः’ की जगह ‘छह’ लिखना चाहिए, जिससे ‘छहों’ बन सके। इस सुझाव को मान लिया गया, तो ‘छिः’ का क्या करेंगे? डा. कपिलमुनि तिवारी ठीक कहते हैं कि भाषा में कुछ चीजें rational होती हैं और कुछ irrational, जिससे उसमें सर्वत्र एकरूपता नहीं लाई जा सकती। मैं भी पहले ‘छह’ ही लिखता था, पर जानकारी बढ़ने के साथ वाजपेयी जी से पीछा छुड़ाया। ‘सोच’ शब्द कायदे से हिंदी में स्त्रीलिंग ही होना चाहिए, क्योंकि यह ‘सोचना’ क्रियापद से बना संज्ञापद है, जैसे ‘समझना’ से ‘समझ’, लेकिन इसका प्रयोग भी दोनों लिंगों में होता है। दिनकर जी से संबंधित वाक्य में ‘आया’ ही होना चाहिए। लगता है यह प्रूफरीडर का कमाल है। मेरे पास लेख की मूलप्रति कि मिलाकर देख सकूं।
अंत में: मित्र से डर कैसा ?

सधन्यवाद
नवल

Wednesday, September 8, 2010

पत्र संख्या-33

पटना, 24. 3. 2003.

संपादक महोदय,
अंक 5 में प्रकाशित अमरेन्द्र कुमार की कविता वाकई अच्छी है। आदमी के जद्दोजहद, पीड़ा और संवेदना को व्यक्त करती अमरेन्द्र की कविता अंदर तक छू जाती है। परंतु पढ़ने के बाद यह बोध भी हुआ कि आदमी से पीड़ा बड़ी है-क्या ऐसा उचित है ? कविता और कवि दोनों में इससे बाहर निकलने की छटपटाहट होनी चाहिए।

अशोक कुमार
राजेन्द्र नगर, पटना.