Tuesday, August 31, 2010

पत्र संख्या-25

फारिसलेन, आदमपुर, भागलपुर, 12.12.02।

प्रिय चि. राजू जी,
जीभर आशीश
आपके द्वारा भेंटस्वरूप प्रदत्त ‘‘दायरा’’ को आद्योपान्त पढ़ा। किताब द्वारा आज के घिनौने राजनेता की अच्छी बखिया उघाड़ा गया है। तोता की आत्मकहानी भी प्रेरणादायक लगा। सबसे नामवर सिंह पर जो आलेख है उसमें अनोखे खोज की बात बतायी गयी है और अपने को दिग्गज कहलानेवाले साहित्यिक धाकड़ रामविलास शर्मा पर अच्छा चोट किया गया है। मिला जुलाकर आज के समाजिक उत्पीड़न की कविता ‘‘रूपकुंवर’’, ‘कुतिया’, ‘तीन दिनों की रैली’ काफी रोचक लगी। ‘‘बाबा’’ की मायावती पर जो कविता है वही इस अंक की जान है। शायद बाबा की निगाह मृत्यु-शय्या पर रहते भी उस नेत्री की फुहड़पन को बताने में बड़ी मसकत करनी पड़ी होगी।

अंत में आपके उस प्रयास के लिये और नये साहित्य सृजन पर अपने को संलग्न करने के लिये पुनः धन्यवाद देता हूं।
आपका
बाबूजी

Monday, August 30, 2010

पत्र संख्या-24

भागलपुर, 6 जून 02।

प्रिय राजू जी,
आशीश।
आपका भेजा ‘‘दायरा 3’’ अंक मिला। थोड़ा पढ़ा हूं। मुख्य पृष्ठ पर आपका सम्पादकीय पढ़ा। जोशी जी को मुंहतोड  उत्तर दिया गया है। साम्प्रदायिकता का (की) खाल ओढ़ कर देशभक्ति का पाठ भारत की जनता को सिखाना चाहते हैं। दूसरा अंतिम पृष्ठ का ‘‘बुढ़ापा’’ भी पढ़ा। याद आयी अपनी जवानी और आज के हलात की मजबूरी। पार्टी के लिये जवानी में बहुत कुर्बानी थी-और निष्ठा से पार्टी से प्यार था-परन्तु सब बेकार सा लगता है। आपने पार्टी अनुभव की बात लिखने को कहा है-कुछ लिख भेजूंगा। ‘‘अफगानिस्तान’’ भी पढ़ा बड़ा रोचक लगा। औरों को पढ़ूंगा और अनुभव लिखेंगे। अपना प्रयास जारी रखें। नितान्त जरूरत है ऐसी चीजों की।
‘‘बाबूजी’’

Sunday, August 29, 2010

पत्र संख्या-23

हाजीपुर, जहानाबाद, 3. 2. 97।

आदरणीय बाबा,
आपकी बीमारी लंबी खींच रही है, दुख है। स्वास्थ्य लाभ की कामना है। मेरे बारे में जो कुछ आपने लिखा है, उसमें अतिरंजना है कि नहीं मैं नहीं कह सकता। आप ही पर छोड़ता हूं। बहरहाल, खिंचाई में कड़ुवापन का स्वाद तो नहीं मिला, अलबता आपके स्वभाव के प्रतिकूल उसमें खीझ के दर्शन अवश्य हुअे (हुए)। ओह! बाबा वे लोग सचमुच बड़े भाग्यशाली होंगे जो बिना श्रम किये ही रास्ता ढूंढ़ लेते हैं... आप उनके बारे में क्या सोचते होंगे जिसे राह ने बीच में ही भरमाया हो यों कहें कि चकमा देकर हतप्रभ कर दिया हो। कुछ के लिए ‘अधूरापन’ टाल देना आसान होता है, मैं चक्कर में पड़ जाता हूं। रूका रह जाता हूं। त्रिशंकु की तरह। आप में सयानापन है, काबिलियत भी इसलिए नुस्खों की भरमार है। आप कुछ लिख रहे हैं। बड़े मजे की खबर है। जारी रखिए आपसे मुलाकात होगी, कवि के मुख से सुनने का आनंद भी मिलेगा, इसका आश्वासन बार-बार मिलता रहेगा, यह उम्मीद बराबर रहेगी।
आपका
अमरेन्द्र

Saturday, August 28, 2010

पत्र संख्या-22

हाजीपुर, जहानाबाद, 20. 3. 96। 

प्यारे बाबा,

हम क्षुद्र लोग हैं। कूपमंडूक हैं। अज्ञानता ही संबल है। आप शुभेच्छु हैं, मेरे लिए आपकी चिन्ता लाजमी है। आप तत्वदर्शी हैं, त्रिकालदर्शी भी। बाप रे! एक ही डूबकी में मेरा भूत, वर्त्तमान और भविष्य तीनों खोज लाना और उसे पूरे सज-धज के साथ बयान करना साधारण कार्य नहीं है। काबिलेतारीफ है। यह मामूली खत नहीं है, एक पूरा घोषणा-पत्र है। कदम-कदम पर चेतावनी, एक से बढ़कर एक नसीहतें और आखिर में मेरी समाप्ति की भविष्यवाणी। आप भाग्य-विधाता हैं, इससे आपकी शोभा में चार-चांद लगता है। नामवर जी को आग फूंक चुकी है। उनमें आप जैसी अकलियत कहां? आपकी बुद्धि की बारूद और गोलन्दाजी के सामने वे नहीं ठहर सकेंगे। हम जैसे लोग उनके पीछे भागें, यह बड़ा संगीन अपराध है, आप चुप न बैठ सकें, यह उचित है। हम जैसे लोगों से कोई उम्मीद बांधे इस पर भरोसा नहीं करता। हंसी जरूर आती है। ताज्जुब भी होता है। फिर भी एक-आध अक्ल का दुश्मन निकल भी आये तो आप जैसा तेज-तर्रार स्कॉलर उसके भ्रम का निवारण नहीं कर पायेगा, ऐसा सोचना पाप होगा। एक विनती है। आप उसे एक चिट्ठी कम-से-कम पोस्ट तो कर ही सकते हैं। इस तरह मैं बैठे-बिठाये एक बड़े भारी कर्ज से मुक्त हो जाऊंगा।

मैं हमला करने में दक्ष नहीं हूं। विश्वास भी नहीं रखता। भाल-रक्षा तो प्राणीमात्र का धर्म है। आशा है जब-तब इसी तरह कृतार्थ करते रहेंगे, बस...।
आपका
अमरेन्द्र

Friday, August 27, 2010

पत्र संख्या-21

मीठापुर, पटना-1.

सेवा में,
आदरणीय,
संपादक महोदय, लोक दायरा!
मैंने आपकी प्रतिष्ठित पत्रिका देखी, देखकर बहुत ही प्रसन्न हुई, बहुत ही नई चिजें (चीजों) को आपने इस पत्रिका में स्थान दिया। इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। मैं भी थोड़ा बहुत लिख लिया करती हूं। इसलिए मैं सोची की (कि) आपकी पत्रिका में अपनी रचना भेजूंगी। पत्र मिलते ही पत्र लिखने का कृपया कष्ट करेंगे। इसके लिए मैं आपकी आभारी रहूंगी। धन्यवाद सहीत (सहित) आपकी
प्रिति कुमारी
हाउस ऑफ चंद्रकला देवी (रेलवे कार्यरत)
नियर-अर्जुन महतो,
भरतलाल टेन्ट हाउस रोड, ‘मीठापुर’, पटना-1

पत्र संख्या-20

हैदराबाद, 4.5.02।

प्रिय भाई राजू जी,
धीरे-धीरे यहां सब ठीक हो रहा है। आज काम किए सप्ताह भर हो गए। सोमवार को प्रेस कार्ड बन जाएगा। मतलब नौकरी पक्की हुई। पर यहां मन जरा भी नहीं लगता। दूसरे दिन ही लौटने को सोचा था। पैसा 5 के उपर (ऊपर) नहीं दे रहा था पर लगता है अब छः के उपर (ऊपर) देगा। मेरी मांग 8 है। ज्यादा दिन यहां नहीं रहा जा सकता। एक कमरा लिया है 600 में। आगे घर लूंगा तो बेबी को लाने की सोचूंगा। मेरे काम से सभी संतुष्ट हैं यहां। बिहार-यूपी के बहुत लड़के हैं। मेरी ड्यूटी 10 से शाम 7 तक है। संपादकीय पेज और फीचर मिला है देखने को। शुरू में अंग्रेजी अनुवाद पर बहस हो गयी थी संपादक से। खूब भाषण पिलाया था उसे फिर भी रख लिया। लगता है उसे मेरी जरूरत थी। बेबी-सोनू की खबर लेंगे। गट्टू कैसा है? आपलोगों की काफी याद आती है।
कुमार मुकुल

Wednesday, August 25, 2010

पत्र संख्या-19

हैदराबाद, 17.9.02।

प्रिय भाई।
यहां सब ठीक है। आप तो ठीक हैं ही। होमियोपैथी डिग्री छः महीने में मिल जाएगी तो पहले यहीं साथ-साथ क्लिनिक खोल दूंगा। कुछ जम जाएगा तो धीरे-धीरे पटना शिफ्ट करूंगा। बाकी लेखन भी चल रहा है। यों स्टार फीचर में साल भर में काफी विकास हो सकता है। बच्चों के लिए एक पत्रिका निकालने की बात आज कह रहा था। फीचरवाला बोला-आपको संपादक बना देंगे। अगर काम बढ़ता है तो आप भी मन बनाए रखिएगा। कुछ दिन..... बेबी से मेरा मैट्रिक, एम. ए. व होम्योपैथी वाले सर्टीफिकेट का फोटो स्टेट जरूर लाने को कहिएगा। गट्टू को कहिएगा पत्र देने को।

आपका
कुमार मुकुल